झारखंड का प्राचीन इतिहास
झारखंड की जनजातीय सस्कृति भारतीय समाज की एक अमूल्य धरोहर है सदियों से इसकी अविरल धारा आज तक प्रभावित होती आई है पश्चात विद्वानों ने यहां के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अध्ययन आरंभ किया था उनके अथक प्रयास से समकालीन भारतीय विद्वानों का ध्यान इस विषय की ओर आकर्षित किया वर्तमान समय में कई पश्चात और भारतीय इतिहासकारों ,जनजातीय समाजशास्त्रियों का मंडली इस विषय पर अध्ययन व शोधरत है।
प्रौद्योगिकी काल में झारखंड धनधोर वनों से अच्छादित था वृक्षों की संघनता ऐसी थी की भूमि पर 05–06 मीटर से अधिक कुछ भी नहीं दिखाई देता था। उस समय जहां भारतीय भू–भाग की अन्य प्रदेशों के सामान ही ऐसा जनजातिय मानवो का निवास था जो अर्ध मानव थे। यहां स्थिति आज से लगभग 20हजार साल पूर्व की थी वनों से आच्छादित होने के बावजूद या प्रदेश बाहा जगत से बिल्कुल कटा हुआ कभी नहीं रहा सदियों से देश का अन्य भागों में इसका जातीय और सांस्कृतिक आदान-प्रदान निरंतर होते रहा हैं फिर भी एक स्वतंत्र भौगोलिक प्रभाव के कारण यह क्षेत्र भारत के अन्य प्रदेशों से इतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से बहुत कुछ भिंन रहा है यहां एक विशिष्ट संस्कृतिक जनजाति सभ्यता का निवास हुआ जिसने बाह्य प्रभाव के बावजूद अपना पृथक पहचान को बनाए रखें विन्धय और कैमूर की पर्वत श्रेणियों में इसे उत्तर दिशा से होने वाले आक्रमण से हमेशा अभयदान किया वास्तव में गुप्तकालीन शासकों एवं बाद में बंगाल के शशाक को छोड़कर प्राचीन भारत के किसी राज्य वंश का शासन इस प्रदेश पर अधिक समय तक नहीं रहा। तुर्क विजेता अपने 300 वर्षों के शासन काल में इस प्रदेश को कभी भी आक्रांत ना करें कर सकें मुगल शासक भी कभी कभार यहां प्रदेश कर सके इसके वनों और पर्वतों ने भारतीय जनजातीय समुदाय को शरण दी उदाहरण स्वरूप मुंडा, हो, संथाल, ऊराव, खरवाल, चेरो आदि आर्यों एवं द्वारा अधिक उपजाऊ प्रदेशों में भगाए जाने पर यह झारखंड में बस से बस गया यहां उत्तरपाषाण काल के अनेक अवशेष प्राप्त किए गए हैं जहां की जनजातियां की संख्या दिन पर दिन कम होती जा रही है लेकिन फिर भी इसके सामाजिक सांस्कृतिक और धार्मिक रहन-सहन में एक ऐसी सभ्यता का आभास मिलता है जो आर्यों के आगमन से पूर्व से अब तक थोड़ी बहुत परिवर्तन के साथ जो किया तो चली आ रही है बाद में सर्दियों में यहां पर नागवंशी चेरो सीहो राकसेलो के प्राया छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य की अस्तित्व में रहे हैं इसके प्राकृतिक संरचना ने इसकी स्थानीय स्वतंत्रता के पनपने से सहायता पहुंचाई पर्वतीय जीवन तथा वनों के कारण यहां के निवासी अत्यंधीक पश्चिमी मिततवायायी सहनशील तथा युद्धप्रिय रहे हैं मुस्लिम आक्रमण के बाद हिंदू धर्म और संस्कृति के संरक्षण ने उत्तर भारत में पलायन कर यहां भी शरण ली।
झारखंड के विभिन्न स्थानों से प्राप्त प्रागैतिहासिक
उपकरण
पुरातात्विक साक्ष्य और झारखंड में जनजातियों का प्रवेश
ऐतिहासिक पुरातात्विक के शोधो के अनुसार झारखंड की अधिकांश जनजाति प्राचीन काल से ही स्थाई रही है यहां के मुंडा भाषी लोगों एवं द्रविड़ ,उरांव आदि में इतनी एकरूपता पाई जाती है कि इन्हें सामाजिक ,धार्मिक और सांस्कृतिक रहन-सहन के संबंध में अलग करना कठिन है । यह लोग भारत के विभिन्न क्षेत्रों स्थानांतरित होते रहे हैं और अंतत झारखंड में स्थाई रूप से बस गए। इनका प्राचीन इतिहास उत्खनन से प्राप्त अवशेषों और कुछ हद तक इस की लोक कथाएं से भी उत्खनन प्राप्त होती है इसके बावजूद ठोस ऐतिहासिक परमाणु परमान परमान कि संदेश आत्मक के कारण इसकी प्रारंभिक अवस्था का क्रमबद्ध विश्लेषण करना कठिन है अनु मानता जब सिंधु घाटी में युगीन संस्कृति का विकास हो रहा था उसी समय इस प्रदेश में नवपाषाण संस्कृति विकसित हुई थी इसके कई पुरातात्विक अवशेषों भी प्राप्त हुई है बुरहरदी गांव में बोल जैसे इतिहासकार को पत्थर का स्लिप प्राप्त हुआ था एस सी रॉय के बुजुर्ग में दारू नदी का तट पर नवपाषाण कालीन उपकरण मिले थे उपकरणों से पत्थरों से निर्मित चाकू की संख्या सर्वाधिक थी 1917 में इसी प्रकार की चीजे सी सेडसन को संजय नदी के किनारे प्राप्त हुई थी इसी प्रकार बुरूहातु में एस सी राय को स्लेटी पत्थर की एक छेनी तथा क्वाइट पत्थर की पालिशदार एक छेनी मिली थी श्री राय को दरगामा गांव में लोहा तथा तांबा की एक आरी मिली थी एक प्रसिद्ध पुरातात्विक बोरमैना ने नवपाषाण कालीन हजारों की 12 प्रकाश पाया है मोर मैना ने इसका उल्लेख प्रसिद्ध पुस्तक द लिनियर थी पैटर्न इन द फ्री हिस्ट्री ऑफ इंडिया में किया है इसमें से अधिकांश हस्त ठाकुर छोटा नागपुर में पाए गए हैं गोल हस्त कुठार और अन्य शिल्प करण इस बात की ओर इंगित करते हैं कि झारखंड में नवपाषाण कालीन सांस्कृतिक प्रभाव दो प्रकार दो बार क्रमिक रूप से आए होंगे हनुमानता प्रथम सांस्कृतिक आगमन 1500 ईसा पूर्व के लगभग और दूसरी इससे भी पूर्व हुआ होगा इस युग में ऑस्ट्रेलाईड इस प्रदेश में प्रवेश की होगी आर्यों के आगमन के पश्चात द्रविड़ उराव,संथाल , चेरों ,खारवाल आदि जनजातियों उत्तर पश्चिमी क्षेत्र से स्थानांतरित होकर झारखंड में पहुंची और यहां की पूर्व ऑस्ट्रेलियाई जनजाति को काफी हद तक प्रभावित किया बिरहोर अशोक खड़िया छोटा नागपुर की प्राचीन जनजातियां है मुंडा हो पूरा जनजातियां बाद की ओर कोहरा प्राचीनतम एवं बाद की जनजातियों के मध्य की है बी एन मजूमदार ने अपनी पुस्तक रिसर्च एंड कलर्स ऑफ इंडिया में लिखा है कि चेरो खरवार भूमि तथा संधान अति जनजाति आदि जनजाति भी बाद के काल की है
झारखंड की प्राचीनतम जनजातियों में एक प्रमुख खड़िया है इसकी जनसंख्या वर्तमान समय में सिंहाभूम तथा मानभूम में काफी कम बचा है झारखंड में ऊनकी अपनी विशेषता बताए भी पाई जाती है उनकी बेहतर स्थिति दक्षिणी कोयल नदी के निकट आसपास के बस्तियों में है प्रारंभिक काल में यह रोहतास से होकर पाटलिपुत्र तक फैला हुआ था वहां से निकलते जाने पर वे दक्षिणी कोयल छेत्र में विभागों में प्रवेश कर गए इसके सर्वप्रथम बस्ती दक्षिणी कोयल के किनारे पारो नामक स्थान में बसी यहीं से वे झारखंड के अन्य प्रदेशों में फैल गई इसके बाद बीरू तसलपुर में इस जनजाति की दूसरी बस्ती बस्ती ऐसा माना जाता है कि रोहतास पटना क्षेत्र में भी दक्षिण भारत की ओर से यह आए थे खड़िया जनजाति की बहुत सारी परिवारिक मान्यता मुंडा ओं की बजाय द्रव्यों से अधिक समरूपता रखती है यही कारण है कि डाल्टन जैसे इतिहासकारो के अनुसार यह जनजातियां संभवत दक्षिण भारत के विंध्य पर्वत श्रेणी उद्योग पार कर मगध क्षेत्र होते हुए छोटा नागपुर में प्रवेश हुआ था
मुंडा और उरांव आदि जनजाति का झारखंड में प्रवेश
मुंडा तथा उरांव रांची झारखंड (छोटानागपुर) से लेकर वर्तमान काल तक इस क्षेत्र की प्रमुख जनजातियां रही है मुंडा का इस प्रदेश में प्रवेश का मार्ग और काल दोनों ही अभी तक अनुमान पर आधारित है बी सी मजूमदार के मस्त में इन्होंने पूर्वर्ती जनजातियों को पूर्व दक्षिण की ओर पलायन को विवश कर छोटानागपुर क्षेत्र पर कब्जा जमा लिया था परंतु एंड इतिहासकार इस बात से सहमत नहीं है ऐसा भी माना जाता है कि छोटा नागपुर की असुर सभ्यता को विनाश करने वाले मुंडा ही थे इसमें मुंडा की प्रसारित ऐतिहासिक धारणा के अनुसार यह लोग आज के मध्य भारत और उत्तर प्रदेश से उस समय पलायन कर गए जब वहां आर्यों का आक्रमण आरंभ हुआ रिंग वेद के अनुसार मगध में आर्यों के विस्तार के बाद वहां से भी हटा कर पहले रोहतास क्षेत्र और बाद में छोटानागपुर आने के लिए विवश होना पड़ा शेरों तथा सबर जैसे जनजातियां तीर ब्राह्मण तथा महाभारत की रचना काल तक मगध में पाई जाती थी इस पति से इसका पलायन बहुत बाद में होगा इसकी पुष्टि ब्राह्मण से भी होती है वाल्मीकि कृत रामायण में इसका दक्षिण की ओर पलायन होने के उल्लेख प्राप्त है यह जनजातियां अपने को मनु के छठे पुत्र पुरुष का वंशज मानते हैं इसके छोटानागपुर क्षेत्र में बस जाने के पश्चात क्षेत्रों की आर्यों से सुरक्षा के लिए त्रिशकु के पुत्र हरिश्चंद्र ने सोन नदी के तट पर एक किले का निर्माण करवाया वह अपने पुत्र रोहिताश के नाम पर इस किले का नाम रोहिताश गढ़ रखा इस तथ्य की पुष्टि जयचंद बिद्यांग कर तथा पृथ्वी सिंह मेहता ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक बिहार एक ऐतिहासिक दिग्दर्शन में की है मुंडा की अवध शासक राम से अच्छा सा बंद था और वनवास से पूर्व उनके राज्य रोहन की तैयारियां में वाद को के रूप में मुंडा जनजाति भी शामिल थे महाभारत में जो पांडवों द्वारा जरासंध की हत्या का उल्लेख है वह मुंडा ओं का मित्र था इस प्रकार कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध में यह कौरवों की ओर से युद्ध में शामिल हुआ था एक परंपरा के अनुसार यह आज गढ़ से छोटा नागपुर आए थे कुछ मुंडा अपनी मूल भूमि के रूप में तिब्बत को भी स्वीकार करते हैं इस परंपरा के अनुसार यह तिब्बत से उत्तरी पूर्वी हिमालय क्षेत्रों से होते हुए अन्य में दक्षिण बिहार पहुंचे यहां से भी पूरा शेरों तथा घरवालों द्वारा भगाए जाने पर यह छोटानागपुर क्षेत्र में प्रवेश कर गए इस समय इसका मिलाएं मंडली का नेता री सा मुंडा था उन्होंने सुतिया पहन को अपना जनजाति के नेता बनाए सुतिया ने अपने नाम के ही एक अनुरूप इस क्षेत्र का नामकरण सुतिया नागभट्ट रखा इस तथ्य की पुष्टि का उल्लेख आर्कन लोधी और सर्वे ऑफ इंडिया की रिकॉर्ड में भी है बाद के सर्दी में मुंडा ने ऐतिहासिक नाग वंश की स्थापना में अपना महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है रिस मुंडा के अनुयाई भूमि की तलाश में संपूर्ण पठारी क्षेत्र में बसते चले गए रिस का ही एक अनुवाई कोरूवा उस प्रदेश में बस गया जो आगे चलकर कोस्बे के नाम से प्रचलित हुई पूरा मुंडा के बाद छोटा नागपुर की प्रमुख जनजातियां है इस जनजाति का संबंध दक्षिण भारत के द्रविड़ एवं पूर्वी दीपों की जनजाति से पश्चिम भारत से उत्तर पश्चिम की ओर होते हुए रोहतास क्षेत्र का है जहां वे शेरों घरवालों द्वारा भगाए जाने पर छोटा नागपुर में प्रवेश कर गए और विशेषकर छोटानागपुर और क्षेत्र में बस गए इस जनजाति की एक शाखा
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